सियासत में एक बार फिर “Urban Naxal” और “Dimaagi Naxal” जैसे शब्दों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले से दिए भाषण में इस्तेमाल किए गए “Dimaagi Naxal” शब्द को पुराने “Urban Naxal” विवाद से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश का तर्क है कि कुछ साल पहले राजनीतिक विरोधियों और असहमति रखने वालों के संदर्भ में “Urban Naxal” शब्द को लेकर सवाल उठे थे। संसद में भी पूछा गया था कि आखिर “Urban Naxal” की आधिकारिक परिभाषा क्या है। सरकार की ओर से जवाब दिया गया था कि यह कोई आधिकारिक कानूनी श्रेणी नहीं है और इसकी कोई निर्धारित परिभाषा नहीं है। अब “Dimaagi Naxal” शब्द के इस्तेमाल के बाद विपक्ष सवाल कर रहा है कि क्या ऐसी भाषा राजनीतिक असहमति को एक खास विचारधारा से जोड़ने के लिए इस्तेमाल की जा रही है।

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इसी बहस में जयराम रमेश ने जाति जनगणना का मुद्दा भी उठाया। उनका दावा है कि जिस मांग को पहले अलग नजरिए से देखा गया, बाद में केंद्र सरकार ने Census 2027 में जाति की गणना शामिल करने का फैसला किया। विपक्ष अब इसे सरकार के बदलते राजनीतिक रुख के उदाहरण के तौर पर पेश कर रहा है। हालांकि, इस पूरे विवाद को समझने के लिए प्रधानमंत्री के पुराने बयानों और उनके मूल संदर्भ की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है। आखिर “Dimaagi Naxal” शब्द किस संदर्भ में इस्तेमाल हुआ? क्या यह किसी खास राजनीतिक विचारधारा के खिलाफ टिप्पणी है या असहमति की राजनीति पर निशाना? और क्या समय के साथ सरकार का किसी मुद्दे पर रुख बदलना राजनीतिक विरोधाभास माना जाना चाहिए? Urban Naxal से Dimaagi Naxal तक की यह बहस फिलहाल सियासत में चर्चा का बड़ा मुद्दा बनी हुई है। आपकी राय क्या है—यह विचारधारा के खिलाफ लड़ाई है या सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी? कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। Saharsa Now के लिए मैं हूँ ______। नमस्कार।