सहरसा का इंदरवा गांव पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के लिए अपनी अलग पहचान रखता है। यहां बड़ी संख्या में ग्रामीणों के घरों में मवेशी हैं और सुबह होते ही दूध निकालने और उसे बाजार तक पहुंचाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। गांव की अर्थव्यवस्था में दूध और पशुपालन की महत्वपूर्ण भूमिका है। यही वजह है कि इंदरवा को लोग स्थानीय स्तर पर ‘मिनी हरियाणा’ के नाम से भी पहचानने लगे हैं। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में पशुपालक होने के बावजूद सरकारी योजनाओं का लाभ हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से पशुपालन के जरिए अपने परिवार का खर्च चला रहे हैं, लेकिन पशुपालकों के लिए चलने वाली कई सरकारी योजनाओं, अनुदान, पशु

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चिकित्सा सुविधाओं, टीकाकरण, बीमा और आधुनिक डेयरी व्यवस्था की उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं है। कई पशुपालक यह भी बताते हैं कि योजनाओं की जानकारी और आवेदन की प्रक्रिया उनके लिए आसान नहीं है। ऐसे में सरकारी सहायता का लाभ लेने के बजाय वे अपने सीमित संसाधनों के भरोसे ही पशुपालन जारी रखने को मजबूर हैं। इंदरवा में दूध का उत्पादन ग्रामीणों के लिए रोजगार और आय का बड़ा साधन बन सकता है। यदि पशुपालकों को बेहतर नस्ल के पशु, पशु आहार, नियमित स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण, प्रशिक्षण, दूध के उचित मूल्य और बाजार की बेहतर सुविधा मिले, तो उनकी आमदनी में काफी बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही डेयरी से जुड़े छोटे उद्योग और रोजगार के नए अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि इंदरवा में कितना दूध पैदा होता है, बल्कि यह भी है कि यहां के पशुपालकों को सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ कब और कैसे मिलेगा। ‘मिनी हरियाणा’ कहे जाने वाले इस गांव की कहानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालन और सरकारी व्यवस्था के बीच मौजूद दूरी को सामने लाती है।