सहरसा जिले के महिषी प्रखंड की नहरवार पंचायत की सुबह एक अलग ही तस्वीर पेश करती है। हल्की धूप के बीच खुले बगीचे में जमीन पर बैठे मछुआरे अपनी बंसी, धागे और कांटे को बड़े धैर्य और सावधानी से तैयार करते हैं। उनके लिए यह केवल मछली पकड़ने का सामान नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका का सबसे बड़ा सहारा है। हर दिन की शुरुआत इसी उम्मीद के साथ होती है कि दिनभर की मेहनत से इतना मिल जाए कि घर का चूल्हा जल सके। नहरवार पंचायत के अधिकांश परिवार पीढ़ियों से मत्स्य आखेट और मछली पालन से जुड़े हुए हैं। यहां मछली पकड़ना सिर्फ एक रोजगार नहीं, बल्कि उनकी पहचान और विरासत का हिस्सा है। लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरागत पेशा कई चुनौतियों से घिर गया है। मछुआरों को तेज़ जलधाराओं, खराब मौसम, दुर्घटनाओं और घटती

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आय जैसी समस्याओं का लगातार सामना करना पड़ता है। दिनभर की कठिन मेहनत के बावजूद उनकी आमदनी इतनी नहीं हो पाती कि आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा सुधार आ सके। मछुआरों का कहना है कि सरकार की ओर से कई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा तो होती है, लेकिन उनका लाभ गांव तक बहुत कम पहुंच पाता है। उनका मानना है कि योजनाओं की जानकारी और सुविधाएं ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो रही हैं। आर्थिक कठिनाइयों के साथ-साथ उन्हें इस बात का भी दुख है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनने और समझने वाला कोई नहीं है। मछुआरे दिलीप मुखिया बताते हैं कि उनके परिवार में दादा-परदादा के समय से मछली पकड़ने की परंपरा चली आ रही है। मल्लाह समाज से आने वाले दिलीप के अनुसार यही उनके परिवार का मुख्य पेशा है। उनके घर में करीब 20 सदस्य हैं, जिनमें अधिकांश लोग मछली पकड़ने का काम करते हैं, जबकि कुछ सदस्य खेती से भी जुड़े हैं। वे कहते हैं कि दिनभर की मेहनत के बाद होने वाली कमाई से किसी तरह परिवार का खर्च चलता है। उनके लिए यह पेशा केवल रोज़गार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है, जिसे तमाम संघर्षों के बावजूद वे आज भी पूरी मेहनत और उम्मीद के साथ निभा रहे हैं।