बिहार के इस गांव में आज भी कई गरीब परिवार कच्चे मकानों में रहने को मजबूर हैं। बारिश, तेज धूप और खराब मौसम के बीच इन परिवारों के लिए सुरक्षित और पक्के घर का सपना अब भी अधूरा है। ग्रामीणों का कहना है कि पूरे गांव में गिने-चुने ही पक्के मकान हैं, जबकि बड़ी संख्या में परिवार वर्षों से कच्चे घरों में रहकर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, कुछ परिवारों को सरकारी आवास योजना का लाभ तो मिला, लेकिन उन्हें पूरी राशि नहीं मिल पाने के कारण कई मकान अधूरे रह गए। ऐसे परिवारों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि सीमित आमदनी में वे अपने स्तर से निर्माण कार्य पूरा नहीं करा पा रहे हैं। इससे सरकारी आवास योजना का उद्देश्य भी सवालों के

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घेरे में आता है। PMAY और Awas Yojana के तहत गरीब परिवारों को पक्का मकान उपलब्ध कराने का उद्देश्य उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक आवास देना है। लेकिन इस गांव की तस्वीर यह सवाल खड़ा करती है कि योजनाओं का लाभ पात्र परिवारों तक पूरी तरह क्यों नहीं पहुंच पा रहा है। अगर राशि किस्तों में मिलती है, तो उसके समय पर भुगतान और निर्माण की प्रगति की निगरानी भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ग्रामीणों ने आवास योजना से जुड़ी अपनी परेशानियां सामने रखते हुए प्रशासन से मदद की मांग की है। उनका कहना है कि अधूरे मकानों को पूरा कराने और जिन परिवारों को अभी तक योजना का लाभ नहीं मिला है, उन्हें आवास उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। यह Bihar Ground Report सिर्फ कच्चे मकानों की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास और सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन की तस्वीर भी सामने लाती है। सवाल यही है कि सरकारी रिकॉर्ड में जिन परिवारों तक योजना पहुंचने का दावा है, क्या वास्तव में उन्हें सुरक्षित और पूरा घर मिल पाया है? गांव, गरीब परिवार, आवास योजना और विकास से जुड़ी ऐसी ही जमीनी खबरों के लिए Saharsa Now से जुड़े रहें।