reported by- akhil malhotra edit by-khushi tiwari
सहरसा. बीते नवंबर माह में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में विकास भले ही मुद्दा रहा. लेकिन पलायन रोकने की बात उससे ऊपर ही रही. जनसुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने इसे चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बनाया. उसके बाद आरजेडी ने इस मुद्दे को आड़े हाथों ले लिया. देखते ही देखते तीन नंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी सभा में इसे सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना लिया. सीएम ने तो पहले ही अगले पांच वर्षों में एक करोड़ लोगों को नौकरी और रोजगार देने का वादा कर लिया था. एनडीए के चुनाव में प्रचंड जीत हासिल करते ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में 25 चीनी मिल सहित एथनॉल की फैक्ट्री खोलने की घोषणा कर दी. सीएम ने इसकी तैयारी भी शुरू कर दी. उन्होंने बिहार में चल रहे उद्योगों का जायजा लिया और वहां कार्यरत कर्मचारियों का हौंसला भी बढ़ाया.
-40 मजदूरों को भोपाल ले जाने आये दो कॉन्ट्रैक्टर-
बिहार के मजदूरों की मांग लगभग देश के अन्य सभी राज्यों में है. छह दिसंबर को सहरसा के शंकर चौक पर मध्यप्रदेश के प्रिंस ऑड और सागर वासवानी दो कॉन्ट्रैक्टर मिले. पूछने पर बताया कि वे यहां से मजदूरों को भोपाल ले जाने आए हैं. बताया कि भोपाल के राइस मिलों में उनका काम चलता है. वहां अभी बिहार के 70 से अधिक मजदूर काम कर रहे हैं. काम का दूसरा बैच भी शुरू होने वाला है. जिसके लिए वे 40 मजदूरों को वहां ले जाने आए हैं. मजदूरों की व्यवस्था हो गई है. वे सभी सहरसा से ट्रेन से सीधे रानी कमलापति जायेंगे, जहां से उन्हें मिल ले जाया जाएगा.
-1500 रुपये रोज तक की बन जाती है दिहाड़ी-
कॉन्ट्रैक्टर ने बताया कि यहां के मजदूर मध्यप्रदेश जाकर इतना कमाते हैं, जितना बिहार में कभी नहीं कमा पायेंगे. उन्होंने बताया कि बिहार में इंडस्ट्रियल एरिया नहीं है, जिससे उन्हें कोई रोजगार नहीं मिल पाता है. यहां दिहाड़ी में बमुश्किल 500 रुपये रोज ही कमा पाते हैं, जबकि एमपी में हजार से 15 सौ रुपये रोज की दिहाड़ी बन जाती है. वे वहां महीने में 40 से 45 हजार रुपये कमा लेते हैं. मजदूरों को ले जाने आये ठेकेदारों ने बताया कि वहां मजदूरों के रहने की व्यवस्था पूरी तरह फ्री है. खाना-पानी भी कंपनी की ओर से प्रोवाइड की जाती है. बीमार पड़ने पर वहीं के अस्पतालों में इलाज की भी सुविधा दी जाती है. ठेकेदारों ने बताया कि उनकी कंपनी में अभी भी बिहार के दर्जनों ऐसे मजदूर हैं, जो तीन-तीन, चार-चार साल से वहां काम कर रहे हैं. कॉन्ट्रैक्टर ने बताया कि मजदूरों को आने-जाने का खर्च तो दिया ही जाता है. साथ ही उन्हें स्थायी रोजगार उपलब्ध कराया जाता है.
-मेहनती और मजबूत होते हैं बिहारी मजदूर-
जब ठेकेदारों से यह पूछा गया कि उन्हें बिहार के ही मजदूर क्यों चाहिए तो, उन्होंने कहा कि यहां के मजदूर काफी मेहनती और मजबूत होते हैं. वे काम से कभी पीछे नहीं हटते हैं. सागर वासवानी ने कहा कि बिहार के मजदूरों में सबसे बड़ी खासियत यह है कि बिहार के मजदूरों को किसी भी फिल्ड में उतार दो, वे उसी मेहनत से काम करते हैं. वासवानी ने कहा कि महाराष्ट्र हो या मध्यप्रदेश, पंजाब हो या हरियाणा, बिहार के मजदूरों के आगे देश के किसी भाग का मजदूर नहीं टिक पाता है.
-परिवार के साथ रहने की खुशी दे सरकार-
घोषणा और कवायद शुरू करने के साथ बड़ा सवाल यह है कि पलायन को रोकने में और कितना समय लगेगा, क्योंकि बिहार से मजदूरों का पलायन अब सिर्फ सीजनल यानी धान-गेहूं रापने और काटने तक सीमित नहीं रह गया है. यहां से मजदूरों का पलायन सालों भर होता रहता है. अब यहां के मजदूर सिर्फ बाहरी प्रदेशों के खेतों में ही काम नहीं करते हैं, बल्कि बाहर की फैक्ट्रियों में स्थायी रूप से काम कर रहे हैं. साल-दो साल में घर आते हैं. सरकार को यहां फैक्ट्री खोल पलायन को शीघ्र रोकने की जरूरत है, क्योंकि राज्य की अच्छी-खासी आबादी अपने परिवार से दूर रह एक बार मिली अपनी जिंदगी बिता देते हैं.
