कभी कोसी क्षेत्र में गन्ने की खेती किसानों के लिए अच्छी आमदनी का बड़ा जरिया हुआ करती थी। खेतों में लहलहाते गन्ने, चीनी मिलों की चहल-पहल और किसानों को अपनी उपज के लिए तैयार बाजार—यह तस्वीर अब धीरे-धीरे बीते दिनों की कहानी बनती जा रही है। समय के साथ कोसी में गन्ने की खेती का दायरा लगातार सिमटता गया और इसका सीधा असर किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा। एक दौर था जब गन्ने की फसल किसानों को बेहतर आमदनी की उम्मीद देती थी। किसान खेतों में मेहनत कर गन्ने की पैदावार करते थे और आसपास की चीनी मिलों तक अपनी उपज पहुंचाते थे। लेकिन चीनी मिलों के बंद होने के बाद किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या बाजार की पैदा हुई। गन्ने की बिक्री के लिए भरोसेमंद व्यवस्था नहीं रही

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और कई किसानों ने धीरे-धीरे गन्ने की खेती से दूरी बनानी शुरू कर दी। आज कोसी के कई इलाकों में गन्ने की मौजूदगी पहले की तुलना में काफी कम दिखाई देती है। खेती का रकबा घटा है और किसानों ने दूसरी फसलों की ओर रुख किया है। गन्ने की खेती से जुड़ी पुरानी आर्थिक गतिविधियां भी कमजोर हुई हैं। दिलचस्प बात यह है कि जहां खेतों में गन्ने की खेती घटती गई, वहीं गन्ने के जूस की मांग आज भी बनी हुई है। बाजार और सड़कों के किनारे गन्ने के जूस की दुकानें गर्मी के मौसम में लोगों को आकर्षित करती हैं। यानी जिस गन्ने से कभी चीनी मिलों में बड़ी मात्रा में चीनी तैयार होती थी, वही गन्ना अब कई जगहों पर जूस के गिलास तक सिमटता नजर आ रहा है। सवाल यह है कि क्या कोसी में गन्ने की खेती को फिर से मजबूत किया जा सकता है? क्या बंद चीनी मिलों और किसानों के बीच बाजार की पुरानी कड़ी दोबारा बनाई जा सकती है? अगर बेहतर बाजार, उचित मूल्य और प्रसंस्करण की व्यवस्था मिले, तो गन्ना एक बार फिर कोसी के किसानों की आय का मजबूत आधार बन सकता है। “जूस तक सिमट गया कोसी का गन्ना”—यह सिर्फ खेती में बदलाव की कहानी नहीं, बल्कि बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की चुनौतियों की तस्वीर भी है।