'वंदे मातरम्' के 150 वर्ष: एक गीत जिसने जगाई आज़ादी की अलख भारत के राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' ने अपने 150 वर्ष पूरे कर लिए हैं। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत केवल साहित्य की अमूल्य धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में से एक रहा है।

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'वंदे मातरम्' पहली बार बंकिम चंद्र के उपन्यास 'आनंदमठ' में प्रकाशित हुआ। इसके बाद यह स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया और देशभर में आज़ादी के दीवानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। अंग्रेज़ी शासन इसे विद्रोह का प्रतीक मानता था और कई स्थानों पर इसके सार्वजनिक गायन पर रोक लगाने की भी कोशिश की गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'वंदे मातरम्' के पहले दो अंतरों को भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया। आज, 150 वर्ष बाद भी यह गीत देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता के मूल्यों का प्रतीक बना हुआ है। इस विशेष रिपोर्ट में जानिए 'वंदे मातरम्' का इतिहास, इसकी रचना, स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका और 150 वर्षों की ऐतिहासिक विरासत।